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    Home » 67% आबादी में कोविड-19 एंटीबॉडी है; टॉप वायरोलॉजिस्ट डॉ. कंग से समझिए तीसरी लहर क्यों नहीं होगी खतरनाक, क्यों खोलने चाहिए स्कूल?

    67% आबादी में कोविड-19 एंटीबॉडी है; टॉप वायरोलॉजिस्ट डॉ. कंग से समझिए तीसरी लहर क्यों नहीं होगी खतरनाक, क्यों खोलने चाहिए स्कूल?

    Swaraj MissionBy Swaraj MissionJul 24, 2021 COVID - 19 No Comments6 Mins Read
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    इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने चौथे सीरो सर्वे के नतीजे जारी कर दिए हैं। जून और जुलाई में 21 राज्यों के 70 जिलों में यह सर्वे कराया गया और 67.6% लोगों में कोविड-19 के खिलाफ एंटीबॉडी मिली है।

    सीरो सर्वे के नतीजे कोविड-19 महामारी के खिलाफ उम्मीद की किरण बनकर आए हैं, पर क्या यह कहा जा सकता है कि भारत में हर्ड इम्यूनिटी बन चुकी है? क्या भारत में तीसरी लहर नहीं आएगी? तीसरी लहर को लेकर जो डराने वाले मैथमेटिकल मॉडल्स आए हैं, उनकी हकीकत क्या है?

    सीरो सर्वे के नतीजों और दुनियाभर में बढ़ते डेल्टा वैरिएंट के केसेज को लेकर हमने देश की टॉप वायरोलॉजिस्ट और क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर में प्रोफेसर डॉ. गगनदीप कंग से बात की। सवाल-जवाब के जरिए उनके ही शब्दों में जानिए कि सीरो सर्वे के आंकड़े क्या कह रहे हैं…

    सीरो सर्वे क्या है और चौथे सर्वे के नतीजे क्या कहते हैं?

    ICMR ने अब तक चार बार ब्लड सीरम सर्वे किए हैं। ब्लड टेस्ट के जरिए देखा जाता है कि कितने लोगों में कोविड-19 के खिलाफ एंटीबॉडी बनी है। इससे यह पता चलता है कि कितनी आबादी को कोविड-19 इन्फेक्शन हो गया है यानी सीरो-प्रिवेलेंस है।

    इससे पहले ICMR ने तीन सर्वे किए थे। मई-जून 2020 में पहले सर्वे में सीरो-प्रिवेलेंस 0.7% रहा था। उसके बाद लगातार सीरो-प्रिवेलेंस बढ़ा है। अगस्त-सितंबर 2020 में दूसरे सर्वे में यह 7.1% और दिसंबर-जनवरी (20-21) में 24.1% रहा। अब जून-जुलाई 2021 के चौथे सर्वे में यह 67.6% हो गया है।

    चौथे सीरो सर्वे से साफ है कि ज्यादातर लोगों में कोविड-19 एंटीबॉडी बन चुकी है। यानी उन्हें किसी न किसी तरह का प्रोटेक्शन मिल गया है। हमारे यहां वैक्सीनेशन की रफ्तार भी कम है। इसे देखते हुए ज्यादा से ज्यादा आबादी में एंटीबॉडी बनना हमारे लिए अच्छा है।

    दुनियाभर में डेल्टा वैरिएंट के केस बढ़ रहे हैं? इसका भारत में क्या असर होगा?

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का कहना है कि कोरोना का अल्फा वैरिएंट 178, बीटा वैरिएंट 123 और डेल्टा वैरिएंट अब 111 देशों में है। पर डेल्टा वैरिएंट जिस तेजी से फैल रहा है, वह जल्द ही दुनिया का सबसे प्रभावी वैरिएंट बन जाएगा।

    अल्फा वैरिएंट कोरोना के ओरिजिनल वैरिएंट के मुकाबले 60% ज्यादा इन्फेक्शियस है। जब बात डेल्टा की आती है तो यह अल्फा से भी 60% ज्यादा इन्फेक्शियस है। अच्छी बात यह है कि अब तक जितने भी वैरिएंट मिले हैं, उन पर हमारे शरीर में बनी इम्यूनिटी ने कुछ न कुछ असर दिखाया है। जब सीरो सर्वे में 67% आबादी में एंटीबॉडी मिली है तो यह हमें कुछ हद तक डेल्टा वैरिएंट को फैलने से रोकेगी। इन्फेक्शन खत्म नहीं होंगे, पर उनके गंभीर होने का खतरा कम हो जाएगा।

    कितनी आबादी में एंटीबॉडी या वैक्सीन लगने पर हर्ड इम्यूनिटी बनेगी?

    85% आबादी में एंटीबॉडी बनेगी तो हर्ड इम्यूनिटी बन सकती है। इसे हम R0 वैल्यू से देखते हैं। यह किसी वायरस की इन्फेक्ट करने की क्षमता होती है। ओरिजिनल वायरस की R0 वैल्यू 2.5 थी। तब कहा गया कि अगर 60% लोगों में एंटीबॉडी बन गई या वैक्सीनेट कर दिया तो हर्ड इम्यूनिटी बन जाएगी। पर उसके बाद अल्फा वैरिएंट आया और अब डेल्टा वैरिएंट हावी है। इसकी R0 वैल्यू 6.5 है। इसे देखते हुए हम कह सकते हैं कि हर्ड इम्यूनिटी के लिए 85% आबादी में एंटीबॉडी जरूरी है। यह एंटीबॉडी नेचुरल इन्फेक्शन से बन सकती है और वैक्सीनेशन से भी।जब हम हेल्थकेयर वर्कर्स का सीरो-प्रिवेलेंस रेट देखते हैं तो यह 90% तक पहुंच चुका है। इसका मतलब यह नहीं है कि सब में एंटीबॉडी बनी ही होगी। पर यह कह सकते हैं कि 85% में तो एंटीबॉडी काम करेगी ही। उन्हें इन्फेक्शन हुआ तो भी गंभीर लक्षण होने की आशंका काफी कम है।

    आम जनता की बात करें तो उसमें सीरो-प्रिवेलेंस 67% है। सिंगल डोज के दायरे में करीब 30% आबादी आई है और पूरी तरह से वैक्सीनेट आबादी सिर्फ 6.5% है। इसे 80%-85% तक पहुंचने में समय लगेगा। इस दौरान कोविड-19 प्रोटोकॉल को फॉलो करना होगा। मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग और हाइजीन का ध्यान रखना ही होगा।

    ICMR ने स्कूल खोलने की सिफारिश की है? क्या यह सही है?

    हां। यह बिल्कुल सही है। सर्वे में 6 से 17 साल तक के बच्चों में सीरो-प्रिवेलेंस 60% तक पहुंचा है। यानी इनके शरीर में एंटीबॉडी बन गई है, पर स्कूल खोलने से पहले सारे टीचर्स, स्टाफ को टीका लगा होना चाहिए। बच्चों को मास्क पहनना सिखाना होगा। क्लासरूम में वेंटिलेशन अच्छा होना चाहिए।

    सबसे जरूरी बात है कि केंद्र और राज्यों की सरकारों को ट्रिगर पॉइंट तय करने चाहिए। इसका मतलब यह है कि अगर केस बढ़े तो स्कूलों को बंद करने की तैयारी होनी चाहिए। जैसी परिस्थिति बनेगी, उस हिसाब से फैसले लेने चाहिए।

    भारत में एक महीने से नए केस 40 हजार पर अटक गए हैं। इसका क्या मतलब है?

    केस तो आते रहेंगे। इससे घबराने की जरूरत नहीं है। आप सीरो-प्रिवेलेंस डेटा देखें तो 30% से अधिक आबादी अब भी कोरोना से इन्फेक्ट नहीं हुई है या उनमें एंटीबॉडी नहीं बनी है। यह आंकड़ा करीब 40-45 करोड़ है। यानी अमेरिका की कुल आबादी का डेढ़ गुना। इन्हें कोरोना का खतरा तो बना हुआ है।

    हमें भारत में टीकाकरण को रफ्तार देनी होगी। तीसरे और चौथे सर्वे में सीरो-प्रिवेलेंस का अंतर बढ़ा है। ग्रामीण इलाकों में 45% और शहरी इलाकों में 35% बढ़ा है। आगे इतनी तेज रफ्तार से सीरो-प्रिवेलेंस नहीं बढ़ेगा। यानी केस तो आएंगे ही।तीसरी लहर आ सकती है, पर अच्छी बात यह है कि अब तक जो भी वैरिएंट आए हैं, उन पर पहले से बनी एंटीबॉडी और वैक्सीन का कुछ न कुछ असर हुआ है। इस वजह से हम कह सकते हैं कि अगर इस एंटीबॉडी से बच निकलने वाला कोई बिल्कुल ही नया वैरिएंट नहीं आया तो तीसरी लहर इतनी भयानक नहीं होगी, जितनी दूसरी लहर थी।

    तीसरी लहर पर डराने वाले मैथमेटिकल मॉडल आए हैं, ये कितने भरोसेमंद हैं?

    बिल्कुल भी नहीं हैं। जो मॉडल्स बना रहे हैं, उन्हें इन्फेक्शियस डिजीज की कोई अंडरस्टैंडिंग नहीं होती है। वे मैथमेटिशियन हैं। कंप्यूटर डेटा के आधार पर प्रिडिक्शन जारी करते हैं। पैंडेमिक की स्टडी बहुत ही स्पेशलाइज्ड फील्ड है।

    आप ही बताइए, क्या आप फ्रैक्चर होने पर कार्डियोलॉजिस्ट के पास जाएंगे? नहीं, आप तो ऑर्थोपीडिक के पास जाएंगे। बस पैंडेमिक को लेकर भी ऐसा ही करना चाहिए। यह बहुत ही स्पेशलाइज्ड फील्ड है। डॉ. गौतम मेनन ने IISc और अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर मॉडल बनाए हैं, वह हकीकत के करीब है, उसमें कोई प्रिडिक्शन नहीं है।

    नोट – ये जानकारी सोशल मीडिया से प्राप्त है। स्वराज मिशन इसकी पुष्टि नहीं करता है।

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