रायपुर, छत्तीसगढ़, दिनांक -18 अप्रैल 2026-
स्वराज मिशन के संपादक, समाजसेवी व राजनीतिक विश्लेषक प्रकाशपुंज पांडेय ने एक लेख के माध्यम से जनता की वेदना के बारे में उल्लेख किया है।
प्रदेश की राजधानी रायपुर की बात करें तो यहां जनता, विकास तो छोड़िए, अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए भी तरस रही है।
रोड और नालियों व पानी की स्थिति –
प्रायः देखा जा सकता है कि जगह-जगह पर रोड और नालियों की हालत जर्जर है। राजधानी होने के बावजूद भी यहां कई वार्डों में पानी की समस्या बहुत जटिल है खासकर तब जब अब गर्मी का मौसम आ चुका है और जगह-जगह अंडरग्राउंड वाटर का स्तर काम होता जा रहा है।
बिजली की समस्या –
बढ़े हुए बिजली के दरों के बावजूद बिजली के बार-बार कटने की शिकायतें प्रायः लोग सोशल मीडिया पर डालते रहते हैं। कुछ जागरूक लोग ऐसे मुद्दों को उठाते भी हैं लेकिन ना ही जनप्रतिनिधि और ना ही अधिकारी उनकी बात को कोई महत्त्व देते हैं।
लापरवाही या भ्रष्टाचार?
समय सीमा में होने वाले काम वर्षों तक लंबित रहते हैं। रोड बनाने से पहले जो कार्य करने चाहिए, जैसे खुदाई आदि वह रोड बनाने के बाद किए जाते हैं और रोड की हालत 6 महीने के अंदर ही खराब हो जाती है। ऐसे कई उदाहरण पूरे राजधानी में देखने को मिल जाएंगे। अब यह लापरवाही है या भ्रष्टाचार आप स्वयं में समझिए?
पलायन और ट्रैफिक की समस्या –
ट्रैफिक की समस्या भी बहुत हद तक बढ़ गई है क्योंकि रोजगार की कमी के चलते छत्तीसगढ़ के लगभग समस्त जिलों से बहुत से लोग पलायन करके राजधानी में आ चुके हैं जिसके कारण राजधानी में ट्रैफिक व्यवस्था चरमरा गई है लेकिन किसी भी सूरत में इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है जिसके कारण आए दिन एक्सीडेंट होते हैं और लोग आपस में रोड पर झगड़ते दिखते हैं।
आवारा पशुओं की समस्या –
एक और बड़ी समस्या आवारा पशुओं की है। प्रायः देखा जा सकता है कि आवारा पशु आए दिन रोड पर गली मोहल्ले में विचरण करते रहते हैं जिसके कारण पार्किंग की समस्या और साथ ही एक्सीडेंट की संभावना बढ़ जाती है लेकिन ना शासन और ना ही प्रशासन को इन सभी बातों की कोई चिंता है।
असली कारण क्या है?
इन समस्याओं का निदान शतप्रतिशत संभव है लेकिन कहीं ना कहीं शासन और प्रशासन की इच्छा शक्ति की कमी साफ दिखाई देती है और इसके लिए कई हद तक जनता स्वयं ही जिम्मेदार है जो प्रश्न पूछने से डरती है। लेकिन आज की पीढ़ी कुछ हद तक ही बर्दाश्त करती है। भारत के आसपास के देशों की जो हालत हुई है, वह किसी से छुपी नहीं है। वह दिन दूर नहीं की जनता सड़क पर उतरेगी और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाएगी।
बुनियादी सुविधाओं से जनता कर वंचित होना किसी एक वजह का परिणाम नहीं है, बल्कि कई गहरे और जुड़े हुए कारणों का असर होता है।

अगर साफ़ तरीके से समझें, तो ये मुख्य कारण सामने आते हैं:
- योजना और क्रियान्वयन में अंतर – सरकारें योजनाएँ तो बनाती हैं, जैसे सड़क, पानी, बिजली, स्वास्थ्य लेकिन असली समस्या जमीन पर लागू करने में आती है। कई बार फाइलों में काम पूरा दिखा दिया जाता है, लेकिन हकीकत में अधूरा रहता है।
- भ्रष्टाचार और संसाधनों की लीकेज – जो पैसा जनता की सुविधाओं के लिए आता है, उसका पूरा उपयोग नहीं हो पाता। बीच में ही लीकेज या भ्रष्टाचार होने से काम की गुणवत्ता और पहुंच दोनों प्रभावित होती हैं।
- प्रशासनिक लापरवाही – कई क्षेत्रों में अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होती। निरीक्षण और निगरानी कमजोर होती है, जिससे खराब काम भी चलता रहता है।
- जनसंख्या और संसाधनों का असंतुलन – जनसंख्या तेजी से बढ़ती है, लेकिन उसी अनुपात में संसाधन और सुविधाएँ नहीं बढ़ पातीं। इससे उपलब्ध सुविधाएँ भी कम पड़ जाती हैं।
- ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों की अनदेखी – शहरों की तुलना में गांवों और दूरस्थ इलाकों में विकास कार्य धीमे होते हैं। वहाँ तक सड़क, अस्पताल, स्कूल जैसी सुविधाएँ पहुँचाने में ज्यादा चुनौती होती है।
- जागरूकता और जनभागीदारी की कमी – कई बार जनता अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं होती या आवाज़ नहीं उठाती। जब दबाव नहीं बनता, तो सुधार भी धीमा रहता है।

प्रकाशपुंज पांडेय

