रायपुर, छत्तीसगढ़: ६ जून २०२५-

प्रकाशपुंज पाण्डेय-

जून का माह चल रहा है, लोग वर्षा के पूर्वागमन से प्रसन्न थे, मई माह के अंत में पड़ने वाले नौतपे में बारिश की फुहारों ने लोगों को राहत पहुंचाई। मई माह के अंत में कुछ दिन अच्छी बारिश होने के बाद ये अनुमान लगे कि नौतपा अब वर्षा के अधीन हो गया, इस वर्ष मानसून पहले ही आ गया। लेकिन जैसे ही जून की शुरुआत हुई, मानो बारिश छूमंतर हो गई। नतीजा ये हुआ कि कड़ी धूप निकलने के कारण ऊमस बढ़ गई। सिर मुड़ाते ही ओले पड़े!

आपको लग रहा होगा कि यह सब तो आपको पता ही है, तो पांडेय जी क्या नया ज्ञान दे रहे हैं। जी हाँ! आपको पता तो है, लेकिन क्या आपको इसके पीछे के कारण का पता है?

इसका मुख्य कारण है, जलवायु परिवर्तन(Climate change / global warming)। बीते कुछ वर्षों से जलवायु परिवर्तन के व्यापक प्रभाव सदृश्य हो रहे हैं। हम प्रकृति को नष्ट कर रहे हैं और अब प्रकृति अपना प्रतिकार ले रही है। जैसे को तैसा!

हमने कोरोना काल से भी कुछ नहीं सीखा, असल में हम(मानव) बहुत होशियार हैं, हमें सिर्फ अपना स्वार्थ ही दिखता है, धन दौलत कमाने के लिए जब हम मानवता को नष्ट कर सकते हैं तो प्रकृति क्या है?

हम भौतिक जीवन में इतने व्यस्त होते जा रहे हैं कि हमें इसके बाद के जीवन की हमें लेशमात्र भी चिंता नहीं है। यह सर्वविदित है कि इस नश्वर जीवन के बाद इस भौतिक जीवन का एक अंश भी हम आगे की यात्रा में अपने साथ नहीं ले जा सकते, बावजूद इसके…. हम नहीं सुधरेंगे! एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी!

हमारे पूर्वजों ने अपने अनुभव से बहुत सी लोकोक्तियाँ, कहावतें और मुहावरे हमें ज्ञान के रूप में दिया हैं, लेकिन हम ठहरे महाज्ञानी, हम नहीं सुधरेंगे! खैर, अब भी नहीं सुधरे तो बाद में पछताने के अलावा हमारे पास अन्य कोई विकल्प नहीं बचेगा। बाद में कहीं ये ना कहना पड़े कि, अब पछतावत होत का, जब चिड़िया चुग गई खेत।

Share.

Comments are closed.