2 अक्टूबर 2019 –

भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की 150 वीं जयंती पर छत्तीसगढ़ विधानसभा में दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। जिसमें छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बड़ा ही रोचक उद्बोधन दिया। पढ़ें पूरा उद्बोधन -

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं कि… आज पूरा राष्ट्र, दूसरे शब्दों में कहूं तो पूरी दुनिया गांधी जी को नमन कर रही है, याद कर रही है। गांधी जी की 150 वीं वर्षगांठ के अवसर पर पूरे देश में अकेली छत्तीसगढ़ विधानसभा है, जिसने 2 दिन का विशेष सत्र आयोजित किया है। इसके लिए माननीय अध्यक्ष को बहुत-बहुत बधाई और शुभकामना। मैं इसके लिए नेता प्रतिपक्ष जी को भी धन्यवाद दूंगा कि उन्होंने इस विशेष सत्र के लिए अपनी सहमति व्यक्त की। गांधी जी के साथ-साथ आज लाल बहादुर शास्त्री जी की भी जयन्ती है, उन्हें भी पूरा राष्ट्र स्मरण कर रहा है, नमन कर रहा है।

माननीय अध्यक्ष महोदय, गांधी जी एक व्यक्ति नहीं, एक जीवनशैली, एक विचार, एक संकल्प है, उनकी 150 वीं जयन्ती है, जिसे दुनिया गांधीवाद के नाम से जानती है। माननीय अध्यक्ष महोदय, जब हम गांधी को याद करते हैं तो उस परम्परा को भी याद करते हैं, जिस परम्परा पर चलकर गांधी जी ने इस लड़ाई की शुरुआत की। गांधी जी संत थे, गांधी जी महात्मा थे, गांधी जी विचारक थे, गांधी जी अहिंसा के पुरोधा थे, गांधी जी अच्छे लेखक थे, अच्छे संगठक थे, अच्छे मार्गदर्शक थे। गांधी जी के आचार-विचार, उनका पहनावा, उनका खान-पान, जो उनके विरोधी थे, उन्होंने भी इन गुणों को कहीं न कहीं आत्मसात किया है। माननीय अध्यक्ष महोदय, जब हम गांधी जी को याद कर रहे हैं तो उस पुरानी परम्परा को भी हमको याद करना चाहिए, जिसकी वजह से गांधी बने। गीता में ये ठीक कहा है कि ‘जब-जब धर्म को हानि होती है और अधर्म का उत्थान होता है तो कोई न कोई महापुरुष, कोई न कोई संत, कोई न कोई समाज-सुधारक इस धरा पर अवतरित होते हैं, जिसे हम लोग अवतार या भगवान या ईश्वर का अंश कहते हैं।’

अध्यक्ष महोदय, प्रत्येक व्यक्ति में जो ब्रह्म है, वही ब्रह्म उस महापुरुष में भी होता है, उससे अलग नहीं। स्वर्ग में पीर, पैगम्बर, महात्मा के लिए कोई अलग से चाक नहीं बना है, जिसमें उसका निर्माण हो। इसी धरा में यहां की परिस्थितियों के अनुरूप उसका निर्माण होता है। जितने भी महापुरुष जन्म लिए, उनके जो विचार आप देखेंगे तो सब एक प्रकार के संदेश नहीं दिए हैं, कुछ न कुछ अंतर दिखाई देता है। जब पूरे देश में हिंसा फैली हुई थी, उस समय महात्मा बुद्ध इस जमीन पर आए। उन्होंने हिंसा का, त्याग का संदेश दिया, उन्होंने संयम का संदेश दिया, संन्यास का संदेश दिया। उसके बाद भगवान शंकर आते हैं। उन्होंने शून्यवाद का उपदेश दिया। उन्होंने निराकार ब्रह्म का संदेश दिया और ये जब लोगों ने देखा कि वह भाव नहीं हो पा रहा है, लोग उससे जुड़ नहीं पा रहे हैं तो फिर रामानुज जैसे संत आते हैं, जो साकार ब्रह्म का आन्दोलन शुरू करते हैं। अध्यक्ष महोदय, फिर कबीर, गुरुनानक देव का अवतरण होता है, जो निराकार ब्रह्म की तरफ फिर से लौट आते हैं, लेकिन एक धारा तब भी चल रही थी, जिसका नेतृत्व करते हुए तुलसीदास जी, सूरदास जी, मीरा जी ये सब साकार ब्रह्म लेकर चल रहे थे, लेकिन 19वीं सदी का जो आन्दोलन है, उसके पहले तक के जितने भी आन्दोलन हुए, उसके केन्द्र में धर्म था, तब सामाजिक और राजनीतिक आन्दोलन नहीं थे, वह केवल धर्म के आन्दोलन थे, लेकिन 19वीं सदी के आते-आते उसे सामाजिक और राजनीतिक कसौटी में कसा जाने लगा। उस समय तक के अंग्रेज जा चुके थे, ईसाइयत का प्रभाव था और उस समय अंग्रेजों ने हिन्दू धर्म को, इस्लाम धर्म को हीन भावना से देखना शुरू किया। उसकी आलोचना शुरू हुई । और न केवल हिन्दुस्तान में, बल्कि दुनिया में उसकी आलोचना होने लगी, तब ब्रह्म समाज की स्थापना राममोहन राय ने की। राममोहन राय धर्म सुधारक नहीं थे, बल्कि समाज सुधारक थे। हमारे अंदर जो कमजोरी थी, हमारे अंदर जो बुराइयां थीं, उनका उन्होंने डटकर मुकाबला किया और जो हमारे अंदर अच्छाइयां थीं, वेदों में, उपनिषदों में जो बातें थीं, उनको दुनिया के सामने रखा और मानवता के विश्ववाद की बात उन्होंने की और उसी समय गोविंद महादेव रानाडे ने महाराष्ट्र में उसी प्रकार आन्दोलन चलाया और उत्तर में पंजाब में दयानंद सरस्वती ने इस प्रकार से आंदोलन चलाया जो भारतीय राष्ट्रीयता की बात, हिन्दू राष्ट्रीयता की बात उन्होंने कही। अध्यक्ष महोदय, उसके तत्काल बाद देखें, जब यह लड़ाई चल रही थी, कौन सा धर्म ऊंचा है, कौन सा धर्म नीचा है, हिन्दू अच्छा है, मुसलमान अच्छा है, क्रिश्चियन अच्छा है, तब रामकृष्ण परमहंस आते हैं, हिन्दुओं के सभी जितने मार्ग हैं, उसकी उपासना उन्होंने की। न केवल हिन्दूमार्गों का बल्कि उन्होंने इस्लाम पद्धति से भी और क्रिश्चियन पद्धति से भी उपासना करके बताया कि सभी मार्ग एक ही ईश्वर तक पहुंचते हैं। कोई विवाद उन्होंने नहीं किया, कोई खंडन नहीं किया, विरोध नहीं किया, लेकिन उन्होंने सिद्ध किया, विनोबा जी ने कहा कि 19 वीं सदी में विश्व को जो भारत की देन है पहला देन रामकृष्ण परमहंस, जिन्होंने है अपने जीवन में यह सिद्ध करके बताया, सारे धर्म का रास्ता एक है, एक ही ईश्वर तक पहुंचता हैं। दूसरा, जो संत हुये, वह महात्मा गांधी हैं। जिन्होंने सत्य और अहिंसा का मार्ग बताया और उस मार्ग पर चलकर देश को आजाद कराया। माननीय अध्यक्ष महोदय, रामकृष्ण परमहंस ने जो बातें कहीं, वही बात कार्यरूप में स्वामी विवेकानंद जी ने पूरे देश और हिन्दुस्तान के बाहर जाकर, दुनिया में जाकर हिन्दू धर्म के बारे में, उन्होंने अपना पक्ष रखा। लेकिन यदि धार्मिक आंदोलन की बात कर रहे हैं, धर्म सुधार की बात, चाहे दयानंद सरस्वती की बात हो, चाहे राममोहन राय की बात हो, गोविंद महादेव रानाडे की बात हो, चाहे रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद की बात कहें, यह धार्मिक राष्ट्रीयता की बात हुई, लेकिन राजनीतिक राष्ट्रीयता की बात यदि किसी ने कही, उसका प्रतिनिधित्व किसी ने किया तो महात्मा गांधी ने किया। महात्मा गांधी में उस प्रकार से गुण नहीं थे, जिस प्रकार से राममोहन राय या दयानंद सरस्वती में थे। न उस प्रकार से उनमें विद्वता थी। न ही विवेकानंद जैसे उनका चुंबकीय व्यक्तित्व था। लेकिन जो हमारे महापुरुषों ने, ऋषियों ने जिस सत्य का अन्वेषण करके बताया, उसे अपने जीवन में अंगीकार करके साकार करने का काम किसी ने किया तो महात्मा गांधी ने किया। गांधी की अहिंसा कमजोर लोगों के लिए नहीं है, यह ताकतवर लोगों की बात है। पशुबल के सामने महात्मा गांधी ने आत्मबल को प्रमुखता दी। पशुबल के सामने, अंग्रेजों के सामने, उन्होंने आत्मबल को खड़ा किया, तोप और बंदूकों के सामने, अहिंसा को खड़ा किया। आखिर अहिंसा ही क्यों, सवाल इस बात का है? गांधी ने अहिंसा का मार्ग क्यों अपनाया? अहिंसा इसलिए, लोग उस समय मानते थे, चूंकि हम अंग्रेजों से लड़ नहीं सकते थे, हमारे पास तोप नहीं है, तलवार नहीं है, बंदूक नहीं है, इसलिए अहिंसा का मार्ग अपनाया। लोगों ने उनकी हंसी भी उड़ाई, दुनिया उन पर हंसती थी, आज तक हिंसक क्रांति के अलावा, कोई दूसरी क्रांति हुई है ? आज तक अहिंसक क्रांति कहीं नहीं हुई है, जो गांधी जी ने शुरू की, लेकिन अध्यक्ष महोदय, अहिंसा की बात बुद्ध ने कही। अहिंसा की बात महावीर ने की, अंहिसा की बात आप वेदों और उपनिषदों में भी पायेंगे। गांधी जी ने पहली बार नहीं कही है। बुद्ध ने अंहिसा की बात कही, वह अपने लिये लागू की, अपने अनुयायियों के लिए लागू की, व्यक्ति के लिए लागू की लेकिन अहिंसा की बात अगर समष्टि के लिए किसी ने की, प्रयोग किया तो केवल गांधी जी ने किया। ये उनकी अहिंसा थी। अहिंसा की ताकत केवल गांधी की दृष्टि देख सकती थी। उन्होंने कहा कि हिंसा तो पशु करते हैं। उनमें भी क्रोध है, उनमें भी द्वेष है, उनमें भी घृणा है। अब जब उनको लड़ना होता है तो पशु हिंसक होते हैं। लेकिन मनुष्य के पास मस्तिष्क है, उस घृणा, द्वेष, क्रोध के आवेग को रोकने का काम मनुष्य कर सकता है और इसलिए गांधी जी ने अहिंसा का मार्ग अपनाया। जब वह पहले अहिंसा की कोई बात कहते थे तो उसका विरोध करते थे, उन्हें गुस्सा आता था, सामने वाले को हीनभावना से देखते थे लेकिन महावीर का जो अनेकांतवाद है कि दूसरे पक्ष से भी उस चीज को देखो क्योंकि पांच अंधे को यदि हाथी के पास भेज दें तो वे लोग हाथी के बारे में अलग-अलग बतायेंगे। यदि किसी ने पैर पकड़ लिया तो वह बोलेगा कि खंभा जैसा है, किसी ने कान पकड़ लिया तो बोलेगा कि वह सूपा जैसा है। सत्य तो वह भी है । इसलिये गांधी जी ने कहा कि अनेकांतवाद, कि जो दूसरा पक्ष बोल रहा है उसके पक्ष में खड़ा होकर उस दृष्टि से देखना और तब गांधी जी अपने विरोधियों/आलोचकों के प्रति भी सहानुभूति रखते थे। अध्यक्ष महोदय, आपको दक्षिण अफ्रीका का आंदोलन याद होगा, आप अभी जोहन्सबर्ग (Johannesburg) का दौरा करके आये हैं, जिन्होंने सजा दिलाई, बार-बार उनका मार्ग अवरुद्ध किया, उनको मरवाने की कोशिश हुई लेकिन उसके प्रति उन्होंने क्या व्यवहार किया ? जब जेल में थे तो गांधी जी हर काम अपने हाथ से करते थे चाहे वह कपड़ा धोने की बात हो, सूत कातने की बात हो। और तो और वह जेल में चप्पल बनाने का काम भी करते थे और जब जेल से बाहर आये तो इस बात को उन्होंने लिखा मैंने एक चप्पल बनाई है, आपकी अनुमति हो तो मैं उसे भेंट करना चाहता हूं। (गांधी जी ने रिहाई के समय जनरल स्मट्स को कारागार में अपने हाथों से बनाई चप्पलें भेंट कीं) ये जो कार्य है, वह यह बताता है कि जिसने उनको सजा दिलायी उसके प्रति भी सहानुभूति का भाव । ये विचार कोई गांधी का नहीं है, ये तो महावीर के समय से चला आ रहा है।

अहिंसा की बात वेदों, उपनिषदों, बुद्ध और महावीर से चली आ रही है। ये बात कदाचित टोल्स्टोय ने भी कही। दुनिया के और विद्वानों ने यह बात कही लेकिन उसे अंगीकार करके साकार रूप से जीवन में उतारने का काम गांधी ने किया इसलिए बुद्ध की अपेक्षा गांधी जी को पूरी दुनिया में अहिंसा का सबसे बड़ा दूत माना जाता है । माननीय अध्यक्ष महोदय, गांधी जी ने एक मार्ग सत्य और अहिंसा का मार्ग अपनाया। हर वह काम जो आम लोग करते थे वह काम उन्होंने शुरू किया। जब विदेश से आये, अफ्रीका से लौटे और कलकत्ता यात्रा में जा रहे थे, फर्स्ट क्लास में लोकमान्य तिलक बैठे थे, किसी ने पूछा कि अब इस देश का नेतृत्व कौन करेगा, कांग्रेस का नेतृत्व कौन करेगा, इस आंदोलन का नेतृत्व कौन करेगा तो तिलक जी ने कहा कि वह पीछे थर्ड क्लास में बैठा हुआ व्यक्ति, वह व्यक्ति नेतृत्व करेगा। आदरणीय अध्यक्ष महोदय, गांधी जी ने पूरे देश का भ्रमण किया, यहां की समस्याओं से रूबरू हुए, उन्होंने सामाजिक ताने-बाने को देखा और तब उन्होंने सबसे पहले अपना वस्त्र त्याग किया, लंगोट धारण किया। आश्रम में वे खुद संडास साफ करते थे, झाडू लगाते थे, खाना बनाते थे, जूता-चप्पल बनाते थे और तो और मरे हुए मवेशी की खाल भी स्वयं उतारते थे। किसी कार्य से उन्होंने घृणा नहीं की। उन्होंने किसी कार्य पर घृणा नहीं की। यह संदेश पूरे हिन्दुस्तान के लोगों को दिया। उन्होंने कामगारों की लड़ाई लड़ी, उन्होंने किसानों की लड़ाई लड़ी, हर वर्ग को लगता था, हर व्यक्ति को लगता था कि गांधी मेरे से जुड़ा हुआ है और इसलिए गांधी फिर पूरे देश के नेता बन गये । अध्यक्ष महोदय, गांधी का जो राष्ट्रवाद है, वह आज जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करते हैं, अभी तक मैंने जितनी बात कही वह सांस्कृतिक राष्ट्रीयता की बात थी। लेकिन कुछ लोग और राष्ट्रवाद की बात करते हैं, वह राष्ट्रवाद कौन सा है? माननीय अध्यक्ष महोदय, गांधी का राष्ट्रवाद, इतना शोर है, राष्ट्रवाद का कि उसमें राष्ट्र को कुचला जा रहा है। नागरिक घुट रहा है, राज्य अपने कर्तव्यों से च्युत हो रहा है और संविधान अर्थहीन होता जा रहा है, यह कैसा राष्ट्रवाद है? गांधी एक ऐसे राष्ट्रवाद की पैरवी करते हैं, जिसकी जड़ें भारतीय समाज की माटी में धंसी होंगी और कालक्रम में गहरी उतरती जायेंगी। गांधी का राष्ट्रवाद सबको साथ में लेकर चलने का है। उन्होंने नारी उत्थान का आंदोलन चलाया, नारी शिक्षा का आंदोलन चलाया, उन्होंने नयी तालीम की शुरुआत की, जो रामकृष्ण परमहंस का स्वामी विवेकानंद को जो संदेश था, “शिव भाव से जीव सेवा”, दरिद्र नारायण का सेवक, जो गरीब हैं, जो बीमार हैं, जो उपेक्षित हैं, उनमें ईश्वर के दर्शन करते हुए उसी भाव से सेवा करना और उसे अपने जीवन में उतारने का काम गांधी ने किया था। गांधी जी के योगदान को लोग भुलाना चाहते हैं, गांधी को उपेक्षित करना चाहते हैं, गांधी जी को बदनाम करना चाहते हैं, लेकिन गांधी जी 150 साल बाद भी आज भी प्रासंगिक हैं, उस समय भी प्रासंगिक थे, आज भी प्रासंगिक हैं और आगे भी प्रासंगिक रहेंगे। गांधी का ग्राम स्वराज, आज उस रास्ते पर छत्तीसगढ़ सरकार चल रही है। हमने किसानों को मजबूत बनाने का काम किया, ऋण माफी ही नहीं, 2500 रुपये क्विंटल धान का मूल्य देकर उनको समर्थ बनाने की कोशिश हमारी है। गांधी ने गाय की सेवा की और इसलिए हमने नारा दिया- ‘छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी नरवा, गरवा, घुरवा, बारी’ पूरे देश और दुनिया में इसकी चर्चा हो रही है।

माननीय अध्यक्ष महोदय, आज इस अवसर पर कुछ नये कार्यक्रमों की घोषणा मैं करना चाहता हूं, जिसमें पहला मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान, दूसरा मुख्यमंत्री हाट बाजार क्लीनिक, मुख्यमंत्री शहरी श्रम स्वास्थ्य योजना, सार्वभौम पी.डी.एस. ए.पी.एल. योजना, मुख्यमंत्री वार्ड कार्यालय योजना। माननीय अध्यक्ष महोदय, इस अवसर पर मैं यह भी घोषणा करना चाहता हूं कि छत्तीसगढ़ में नक्सल हिंसा हो रही है और जिनके परिवार उसमें हताहत हुए हैं, मौतें हुई हैं, जो बेघर हो चुके हैं, उनके लिए छत्तीसगढ़ सरकार मकान बनाकर देगी। मैं इस अवसर पर यह भी घोषणा करता हूं जो वंचितजनों के, जो आदिवासियों की सेवा करते जिन्होंने जीवन व्यतीत किया, स्वर्गीय प्रभुदत्त खेड़ा जिन्होंने पूरा जीवन आदिवासियों की सेवा में गुजार दिया। उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए, हम नमन भी करते हैं साथ ही हैं ऐसे अधिकारी, जनप्रतिनिधि, संस्था, संस्थाओं के प्रतिनिधि जो आगामी वर्ष में बहुत अच्छा काम करेंगे, उनको भी स्वर्गीय प्रभुदत्त खेड़ा के नाम से पुरस्कार दिया जायेगा।

माननीय अध्यक्ष महोदय, दो विचारधाराएं चली आ रही हैं। एक विचारधारा जिसका नेतृत्व महात्मा गांधी करते थे, उनके साथी करते थे, उनके अनुयायी करते थे | दूसरा जो नहीं चाहते थे कि देश आजाद हो, देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा रहे, जो नहीं चाहते थे कि ज्ञान का प्रकाश आमजनों, गरीबों, वंचितों तक पहुंचे। जो हिन्दुस्तान की संपदा हैं, वे लोग उसके हकदार बन सकें, ऐसी विचारधारा के लोग भी थे। माननीय अध्यक्ष महोदय, आज जब हम महात्मा गांधी जी को याद करते हैं, तो गोडसे का भी स्मरण होता है, जिसने उनकी हत्या की। एक विचारधारा का प्रतिनिधित्व गोडसे ने किया। लोग कहते हैं कि पाकिस्तान के विभाजन के कारण गोडसे ने उनकी हत्या की, लेकिन इतिहास बताता है कि यह उनका पहला प्रयास नहीं था, ये उनका अंतिम प्रयास था। इसके पहले भी जब पाकिस्तान की बात भी नहीं चली थी तब भी गोडसे ने उनकी हत्या का प्रयास किया है। माननीय अध्यक्ष महोदय, वह प्रतिगामी ताकतें, तो हिन्दुस्तान को हमेशा गुलाम रखना चाहती थीं, वह हजार सालों से गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहे, उस विचारधारा के लोगों का प्रतिनिधित्व गोडसे ने किया, उनकी हत्या की। माननीय अध्यक्ष महोदय, आज जहां महात्मा गांधी जी की जय-जयकार हो रही है तो गोडसे की भर्त्सना होनी चाहिए, उसके भी मुर्दाबाद के नारे लगने चाहिए।

माननीय अध्यक्ष महोदय, महात्मा गांधी जी को अपनाना है तो साफ दिल, खुले मन से अपनाने की आवश्यकता है और गांधी जी को अपनाने का मतलब उनके आदर्शों, अहिंसा के मार्ग, साफगोई, सत्य के मार्ग को अपनाना होगा, जो हमारे संत महात्माओं ने जो रास्ता बताया। षडयंत्र और हिंसा का मार्ग जो अपनाते थे, उनकी निंदा करनी होगी और मैं आपसे कहना चाहता हूं कि जो लोग केवल दिखावे के लिए गांधी जी का नाम ले रहे हैं। लेकिन गोडसे की भर्त्सना नहीं कर पा रहे हैं, मैं उनसे कहना चाहता हूं कि वह थोड़ा साहस, हिम्मत करें और गांधी जी की जयकार के साथ गोडसे के विरोध और मुर्दाबाद के नारे भी लगायें ।

माननीय अध्यक्ष महोदय, आज मैं ये प्रस्ताव करता हूं कि आज उनकी 150 वीं जयंती पर एक कृतज्ञ राष्ट्र की तरह हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने बापू के विचारों को आत्मसात करते हुए जनसेवा का रास्ता अपनाया है। यह सदन संकल्प लेता है कि हम महात्मा गांधी द्वारा प्रशस्त मार्ग पर चलेंगे और समाज में साम्प्रदायिक सद्भाव और समरसता बनाये रखेंगे और सभी सामाजिक बुराइयों से साथ मिलकर लड़ेंगे। माननीय अध्यक्ष महोदय, कल आपने कक्ष में एक बात कही थी। जिस प्रकार से मध्यप्रदेश में गांधी भवन | बना है। उसी प्रकार से छत्तीसगढ़ में भी गांधी भवन, नई राजधानी में बनेगा। और जो उनकी कंडेल यात्रा है, रायपुर, दुर्ग की जो यात्रा है, उसे चिरस्थायी बनाने के लिए सरकार काम करेगी। आपने जो मुझे बोलने का समय दिया, उसके लिए हृदय से धन्यवाद ।

साभार :- छत्तीसगढ़ विचार माला
“गढ़बो नवा छत्तीसगढ़”

Share.

Comments are closed.