क्या आपको पता है कि इंसानों की तरह देवता भी दीपावली मनाते हैं। इसके लिए वे स्वर्ग से उतरकर धरती पर आते हैं। इस खास दिन को देव दीपावली के रूप में मनाया जाता है। जानें कब और कहां पृथ्वी पर उतरेंगे सभी देवी-देवता।

  • काशी में दो बार मनाया जाता है दीवालीका त्योहार
  • देव दीयली पर धरती पर उतर आते हैं सभी देवता 
  • इंसानों की तरह देवता भी मनाते हैं दीपावली

वाराणसी : पूरा देश अभी हाल ही में त्योहारों के बाद अपने काम पर अग्रसर हो रहा है। हालांकि कई जगहों पर तो अभी छठ की वजह से त्योहारी तैयारी चालू है। देशभर के लोगों ने हाल ही में बड़ी धूमधाम से दीवाली मनाई। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दीवाली साल में सिर्फ एक ही बार नहीं आती। आपको बता दें कि पूरे ब्रह्मांड में वाराणसी एक मात्र ऐसी जगह है, जहां एक नहीं बल्कि दो बार दीपावली (Deepawali) मनाई जाती है। इसमें से एक दीवाली का संबंध इंसानों से है तो वहीं दूसरी दीपावली देवताओं की होती है, जिसे लोग देव दीपावली के नाम से जानते हैं।

पृथ्वी पर उतर आते हैं सभी देवी-देवता

दीपों का यह महापर्व कार्तिक मास के बाद कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस साल यह पावन पर्व 19 नवंबर 2021 को मनाया जाएगा। देव दीपावली (Dev Diwali) के दिन जब वाराणसी में गंगा के घाटों के किनारे जब लाखों दीये एक साथ जलते हैं तो मानो ऐसा लगता है कि आसमान से सारे देवी-देवता पृथ्वी पर उतर आए हों।

देवों के स्वागत को सज चुकी है काशी

काशी में देवताओं के धरा पर उतरने का पर्व देव दीपावली मनाने की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। सिर्फ 12 दिन और शेष बचे हैं जब दीपों की रोशनी से एक साथ 84 गंगा घाट जगमगा उठेंगे। दीपों की दमक से पहले काशी में पर्यटन उद्योग से जुड़े व्यवसायियों के चेहरे खिल उठे हैं। दरअसल, देव दीपावली के मद्देनजर जहां होटलों की बुकिंग फुल हो चुकी है। वहीं तीन घंटे के लिए ढाई से तीन लाख रुपये में बजड़े की बुकिंग हो रही है।

ऐसे मनाई जाती है देव दीपावली

देव दीपावली के दिन नदी के किनारे दीये जलाने का बहुत महत्व है। यही कारण है कि इस दिन वाराणसी के सभी घाट दीये से जगमग करते नजर आते हैं, जिसे देखने के लिए लोग हर साल देश-विदेश से वाराणसी पहुंचते हैं। देव दीपावली के भव्य नजारे को देखने और अपने कैमरे में कैद करने के लिए लोग महीनों पहले से होटल और नावों की बुकिंग करवा लेते हैं। रोशनी से सराबोर गंगा के घाटों को देखकर हर आदमी उसी में खो जाता है और गंगा की शीतलता और पवित्रता में डूब जाना चाहता है।

कुछ ऐसा है इस दिन का महत्व

पौराणिक कथा के अनुसार इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया था, इसलिए इसे त्रिपुरारी पूर्णिमा (Tripurari Purnima) भी कहते हैं। इसी उपलक्ष्य में बाबा विश्वनाथ की नगरी में बड़े धूमधाम से दीपावली मनाई जाती है। इसके अलावा मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा पर ही भगवान विष्णु ने मत्स्यावतार भी लिया था। इसी दिन सिख गुरु नानक देव जी का जन्म भी हुआ था। इसलिए इस दिन को नानक पूर्णिमा के नाम से भी जानते हैं। साथ ही देव दीपावली के दिन तुलसी जी और भगवान शालिग्राम की भी विशेष पूजा की जाती है।

काशी में ऐसे हुई शुरुआत

मान्यता है कि वाराणसी में देव दीपावली को इस तरह से मनाने की शुरुआत 1986 में तत्‍कालीन काशी नरेश डॉ. विभूति नारायण सिंह के माध्यम से हुई थी। इसके बाद धीरे-धीरे यह महामहोत्सव के रूप में प्रसिद्ध हो गया।

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