जिले के बारे में
बस्तर, भारत के छत्तीसगढ़ प्रदेश के दक्षिण दिशा में स्थित जिला है। बस्तर जिले एवं बस्तर संभाग का मुख्यालय जगदलपुर शहर है।
इसका क्षेत्रफल 6596.90 वर्ग कि.मी. है। बस्तर जिला छत्तीसगढ़ प्रदेश के कोंडागांव, सुकमा, बीजापुर जिलों से घिरा हुआ है।
बस्तर जिले की जनसंख्या वर्ष 2011 में 834375 थी। जिसमे 413706 पुरुष एवं 420669 महिलाएं थी।
बस्तर की जनसन्ख्या मे 70 प्रतिशत जनजातीय समुदाय जैसे गोंड, मारिया, मुरिया, भतरा, हल्बा, धुरुवा समुदाय हैं। बस्तर जिला को सात विकासखंड/तहसील, जगदलपुर, बस्तर, बकावंड, लोहंडीगुडा, तोकापाल, दरभा, बास्तानार में विभाजित किया गया है।
बस्तर जिला सरल स्वाभाव जनजातीय समुदाय और प्राकृतिक सम्पदा संपन्न हुए प्राकृतिक सौन्दर्य एवं सुखद वातावरण का भी धनी है। बस्तर जिला घने जंगलों, ऊँची, पहाड़ियों, झरनों, गुफाओ एवं वन्य प्राणियों से भरा हुआ है। बस्तर जिले के लोग दुर्लभ कलाकृति, उदार संस्कृति एवं सहज सरल स्वभाव के धनी हैं।
कैसे पहुंचें
वायुमार्ग से

जगदलपुर (बस्तर ) का स्वंय हवाई अड्डा है | यहाँ से डी.आर.डी.ओ,एयर फोर्स,बी.एस.एफ एवं सी.आर.पी.एफ. निजी चार्टर प्लेन संचालित करते हैं | छत्तीसगढ़ का मुख्य हवाई अड्डा स्वामी विवेकानंद हवाई अड्डा, रायपुर है ,जिसकी दूरी जगदलपुर(बस्तर ) से 300 किमी है । यह भोपाल, इंदौर, दिल्ली, कोलकाता और मुंबई आदि जैसे प्रमुख शहरों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।
सड़क मार्ग से

राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच 30 और रायपुर, भिलाई आदि जैसे कई अन्य राज्य राजमार्गों के एक अच्छी तरह से जुड़ा रोड़ नेटवर्क हैं। जगदलपुर से एवं जगदलपुर के लिए नियमित बस सेवाएं, एक्सप्रेस या स्लीपर बसे चलती है | जगदलपुर के अंतर्राज्यीय बस स्टैंड से तेलंगाना राज्य परिवहन निगम की बस जगदलपुर से हैदराबाद ,आंध्र प्रदेश राज्य परिवहन निगम की बस जगदलपुर से विशाखापट्नम ,विजयवाड़ा एवं राजमेहंदरी ,ओड़ीशा राज्य परिवहन से मलकानगिरी,भुवनेश्वर एवं जयपुर ओडिशा में लिए नियमित बसे हैं |
रेलमार्ग से

जगदलपुर रेलवे लाइन से विशाखापट्नम एवं रायपुर से भी जुड़ा हुआ है |जगदलपुर रेलवे स्टेशन को लौह अयस्क के किरंदुल से विशाखापत्तनम परिवहन हेतु मुख्य रूप से उपयोग किया जाता है | इसका संचालन पूर्व तट रेलवे द्वारा किया जाता है | यहाँ से विशाखापत्तनम -किरंदुल ,दुर्ग-जगदलपुर ,हावडा-कोरापुट ,हीराकुंड एक्सप्रेस एवं जगदलपुर -विशाखापत्तनम (रात्रिकालीन एक्सप्रेस ) का संचालन किया जा रहा है |वर्तमान में रावघाट -जगदलपुर रेलवे लाइन का कार्य प्रगति पर है |
रुचि के स्थान
बस्तर ,भारत के छत्तीसगढ़ प्रदेश के दक्षिण दिशा में स्थित जिला है। बस्तर जिले एवं बस्तर संभाग का मुख्यालय जगदलपुर शहर है। ख़ूबसूरत जंगलों और आदिवासी संस्कृति में रंगा ज़िला बस्तर, प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी के तौर पर जाना जाता है। 6596.90 वर्ग किलोमीटर में फैला ये ज़िला एक समय केरल जैसे राज्य और बेल्जियम, इज़राइल जैसे देशॊ से बड़ा था। बस्तर जिला सरल स्वाभाव जनजातीय समुदाय और प्राकृतिक सम्पदा संपन्न हुए प्राकृतिक सौन्दर्य एवं सुखद वातावरण का भी धनी है।
उड़ीसा से शुरू होकर दंतेवाड़ा की भद्रकाली नदी में समाहित होने वाली करीब 240 किलोमीटर लंबी इंद्रावती नदी बस्तर के लोगों के लिए आस्था और भक्ति की प्रतीक है। इंद्रावती नदी के मुहाने पर बसा जगदलपुर एक प्रमुख सांस्कृतिक एवं हस्तशिल्प केन्द्र है। यहां मौजूद मानव विज्ञान संग्रहालय में बस्तर के आदिवासियों की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं मनोरंजन से संबंधित वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं। डांसिंग कैक्टस कला केन्द्र, बस्तर के विख्यात कला संसार की अनुपम भेंट है। बस्तर जिले के लोग दुर्लभ कलाकृति, उदार संस्कृति एवं सहज सरल स्वभाव के धनी हैं ।
बस्तर जिला घने जंगलों, ऊँची, पहाड़ियों, झरनों, गुफाओ एवं वन्य प्राणियों से भरा हुआ है। बस्तर महल, बस्तर दशहरा ,दलपत सागर, चित्रकोट जलप्रपात, तीरथगढ़ जलप्रपात, कुटुमसर और कैलाश गुफ़ा आदि पर्यटन के मुख्य केंद्र हैं –
चित्रकोट जलप्रपात, तीरथगढ़ जलप्रपात, कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, कुटुम्बसर गुफा, बस्तर दशहरा,
संस्कृति और विरासत
बस्तर की कुछ परम्पराएं तो आपको एक रहस्यमय संसार में पंहुचा देती हैं। वह अचंभित किए बगैर नहीं छोड़ती। वनवासियों के तौर तरीके हमें सोचने पर मजबूर करते हैं कि चांद पर पहुंच चुकी इस दुनिया में और भी बहुत कुछ है, जो सदियों पुराना है, अपने उसी मौलिक रूप में जीवित है। बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक दशहरे को देशभर में उत्साह के साथ मनाया जाता है. इस दिन भगवान राम ने लंकापति रावण का वध कर देवी सीता को उसके बंधन से मुक्त किया था. इस दिन रावण का पुतला जलाकार लोग जश्न मनाते हैं. लेकिन भारत में एक जगह ऐसी है जहां 75 दिनों तक दशहरा मनाया जाता है लेकिन रावण नहीं जलाया जाता है

यह अनूठा दशहरा छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल इलाके बस्तर में मनाया जाता है और ‘बस्तर दशहरा’ के नाम से चर्चित है. इस दशहरे की ख्याति इतनी अधिक है कि देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ-साथ विदेशों से भी सैलानी इसे देखने आते हैं. बस्तर दशहरे की शुरुआत श्रावण (सावन) के महीने में पड़ने वाली हरियाली अमावस्या से होती है. इस दिन रथ बनाने के लिए जंगल से पहली लकड़ी लाई जाती है. इस रस्म को पाट जात्रा कहा जाता है. यह त्योहार दशहरा के बाद तक चलता है और मुरिया दरबार की रस्म के साथ समाप्त होता है. इस रस्म में बस्तर के महाराज दरबार लगाकार जनता की समस्याएं सुनते हैं. यह त्योहार देश का सबसे ज्यादा दिनों तक मनाया जाने वाला त्योहार है|

मिस्त्र के पिरामिड़ तो पूरी दुनिया का ध्यान खींचते हैं, दुनिया के आठ आश्चर्य में शामिल हैं। लेकिन बस्तर में भी कुछ कम अजूबे नहीं है। यहां भी एक ऐसी ही अनोखी परंपरा है, जिसमें परिजन के मरने के बाद उसका स्मारक बनाया जाता है। भले ही वह मिस्त्र जैसा भव्य न हो, लेकिन अनोखा जरूर होता है। इस परंपरा को मृतक स्तंभ के नाम से जाना जाता है। दक्षिण बस्तर में मारिया और मुरिया जनजाति में मृतक स्तंभ बनाए बनाने की प्रथा अधिक प्रचलित है। स्थानीय भाषा में इन्हें “गुड़ी” कहा जाता है। प्राचीन काल में जनजातियों में पूर्वजों को जहां दफनाया जाता था वहां 6 से 7 फीट ऊंचा एक चौड़ा तथा नुकीला पत्थर रख दिया जाता था। पत्थर दूर पहाड़ी से लाए जाते थे और इन्हें लाने में गांव के अन्य लोग मदद करते थे।

छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों के माड़िया जाति में परंपरा घोटुल को मनाया जाता है, घोटुल में आने वाले लड़के-लड़कियों को अपना जीवनसाथी चुनने की छूट होती है। घोटुल को सामाजिक स्वीकृति भी मिली हुई है। घोटुल गांव के किनारे बनी एक मिट्टी की झोपड़ी होती है। कई बार घोटुल में दीवारों की जगह खुला मण्डप होता है।

पर्यटक स्थल
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